| जबलपुर के संस्कारधानी में एक शिवालय ऐसा भी है, जिसका शिखर स्वर्ण जडि़त है। इस वजह से कई बार नास्तिक तबीयत के चोरों ने हाथ साफ करने की कोशिश की, लेकिन वे नाकाम रहे। दरअसल, इस मंदिर को किसी बाहरी सुरक्षा की दरकार नहीं, क्योंकि यहाँ सबकी रक्षा और कल्याण करने वाले भूतभावन महादेव का वास है। वे हर बाधा को हर लेते हैं। |
| आइए श्रावण सोमवार के शुभ दिन आपको टेमर-भीटा स्थित इस चमत्कारी शिव मंदिर की महिमा से परिचित कराते हैं। |
| शिलालेख के मुताबिक 1881 में ग्राम के प्रतिष्ठित गोस्वामी परिवार ने इस चतुष्कोणीय महाशिव मंदिर का निर्माण कराया था। सवा सौ साल बाद भी इसका स्वरूप जस का तस है। समीप ही बनवाए गए दो कुएँ मीठे जल के स्रोत हैं। वहीं आसपास रोपे गए पौधों ने आज विशाल दरख्तों की शक्ल ले ली है। बेल का छतनार वृक्ष सालभर शिवप्रिय बेलपत्र की सहज उपलब्धता सुनिश्चित कराता है। |
| शिव मंदिर के कारण इस इलाके को शिव मंदिर मोहल्ले के नाम से पुकारा जाता है। पूर्वज हरवंश गिरि, गुमान गिरि, प्रेम गिरि, शंकर गिरि, परशराम गिरि, लाल गिरि के बाद वर्तमान में पांचवीं पी़ढ़ी के गोविन्द गिरि, जगन्नाथ गिरि और बलराम गिरि गोस्वामी नियमित पूजापाठ कर रहे हैं। |
| इस शिवालय में नंदी महाराज को शिवलिंग के सामने न बैठाकर पीछे बैठाया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सामने प्रतिष्ठित नंदी शिवपूजा के आधे पुण्य के भागी बन जाते हैं। चूँकि इस मंदिर में नंदी को पीछे कर दिया गया है, अतः आस्था है कि पूजा करने वालों को समग्र पुण्य लाभ होता है। इसके अलावा जिलहरी को अन्य शिवालयों के विपरीत पूर्वामुखी रखा गया है। जिस पर प्रातः सूर्य कि पहली किरण पड़ती है। इस तरह भक्तों के लिए कल्याणकारी ऊर्जा संचित होती है। |
| यहाँ के धर्मप्रवण लोगों के अनुसार विगत वर्ष जोरदार गाज गिरने की आवाज आई। सब आशंकित थे कि न जाने किसका नुकसान हुआ होगा, लेकिन कहीं से कोई समाचार नहीं मिला। सुबह जब शिवालय के पट खुले तो देखा कि टाइल्स चकनाचूर थी। इस तरह साफ था कि स्वर्णजडि़त शिखर पर लगे त्रिशूलनुमा दिशासूचक ने तडि़त चालक की भूमिका निभाई या यूँ कहिए कि साक्षात शिव ने गाँव की रक्षा के लिए गाज को गरल की तरह पी लिया। सचमुच भोलेनाथ की महिमा अपरंपार है। |
| शिवालय में श्री सूर्यदेव, पद्मासनी गौरी और सिद्ध गणेश, गंगामैया, नर्मदामैया, दत्तात्रेय और भैरव के विग्रहों के अलावा चौसठयोगिनी भी विराजमान हैं। |
Friday, 16 May 2014
चतुष्कोणीय शिव मंदिर की महिमा
शिव के पौराणिक शिवालय
| यूँ तो प्रत्येक शहर और गाँवों में शिव के अनेकों शिवालय है, जिनमें से अधिकतर का अपना अलग पुरातात्विक और पौराणिक महत्व भी है। पुराणों में बारह ज्योर्तिलिंग के अलावा भी शिव के पवित्र स्थानों का उल्लेख मिलता है। प्रत्येक स्थान से जुड़ी अनेक कथाएँ हैं तथा इसका खगोलीय महत्व भी है। हम जानते हैं कि प्रमुख रूप से भगवान शिव के कौन-कौन से स्थान है। |
| कैलाश पर्वत : कैलाश पर्वत भगवान शिव का मुख्य निवास स्थान है। कैलाश पर्वत चीन के तिब्बती इलाके में है। पर्वत के नजदीक ही विश्व प्रसिद्ध मानसरोवर झील है जहाँ माँ पार्वती स्नान करती थी। पुराणों अनुसार उक्त स्थान के नीचे ही पाताल लोक है जहाँ भगवान विष्णु विराजमान है। कैलाश पर्वत के लाखों योजन ऊपर ब्रह्मा का स्थान माना गया है। |
| ज्योतिर्लिंग : ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएँ प्रचलित है। विक्रम संवत के कुछ सहस्राब्दी पूर्व उल्कापात का अधिक प्रकोप हुआ। आदि मानव को यह रुद्र का आविर्भाव दिखा। शिव पुराण के अनुसार उस समय आकाश से ज्योति पिंड पृथ्वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। यही उल्का पिंड बारह ज्योतिर्लिंग कहलाए। |
| 12 ज्योतिर्लिंग :- (1) सोमनाथ, (2) मल्लिकार्जुन, (3) महाकालेश्वर, (4) ॐकारेश्वर, (5) वैद्यनाथ, (6) भीमशंकर, (7) रामेश्वर, (8) नागेश्वर, (9) विश्वनाथजी, (10) त्र्यम्बकेश्वर, (11) केदारनाथ, (12) घृष्णेश्वर। |
| अमरनाथ : वैसे जो जम्मू और कश्मीर में सैकड़ों प्राचीन शिव मंदिर है और हिन्दू पंडितों द्वारा पलायन करने के बाद सैंकड़ों मंदिर तोड़ दिए गया है किंतु विश्व प्रसिद्ध अमरनाथ तीर्थ स्थल का ही ज्यादा महत्व है। यह वह स्थान है जहाँ भगवान शिव ने माँ पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। इस स्थान को अमरनाथ की गुफा कहा जाता है। स्थानीय लोग इसे 'बर्फानी बाबा' की गुफा के नाम से पुकारते हैं। गुफा श्रीनगर से उत्तर-पूर्व में 135 सहस्त्रमीटर दूर समुद्रतल से 13,600 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। इस गुफा की लंबाई 19 मीटर, चौड़ाई 16 मीटर और ऊँचाई 11 मीटर है। |
| अरुणाचलेश्वर मंदिर : यह बहुत ही प्राचीन मंदिर है जो एक विशालकाय पर्वत पर स्थापित है। तिरुअन्नामलाई नामक कस्बे में स्थित यह मंदिर चेन्नई से 187 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस मंदिर से जुड़ी कथा का शिव पुराण में उल्लेख मिलता है। भगवान शिव के पंचभूत क्षेत्रों में से एक अरुणाचलेश्वर मंदिर को अग्नि क्षेत्र माना जाता है जबकि काँची और तिरुवरुवर को पृथ्वी, चिदंबरम को आकाश, कलष्टी को वायु और तिरुवनिका को जल क्षेत्र माना जाता है। |
| श्रीकालहस्ती : आंध्रप्रदेश के तिरुपति शहर के पास पेन्नारजी की शाखा स्वर्णामुखी नदी के तट पर बसा कालहस्ती नामक स्थान पर भगवान शंकर का बहुत ही प्राचीन मंदिर स्थित है, जिसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। दक्षिण भारत में स्थित भगवान शिव के तीर्थस्थानों में इस स्थान का विशेष महत्व है। नदी तट से पर्वत के तल तक विस्तारित इस स्थान को दक्षिण कैलाश व दक्षिण काशी नाम से भी जाना जाता है। |
| सिद्धनाथ महादेव : पाँडवों ने मालवा क्षेत्र में पाँच शिव मंदिर बनाएँ थे उनमें से एक है सिद्धनाथ महादेव का मंदिर। यह मंदिर पुण्य सलिला नर्मदा के किनारे बसे नगर नेमावर में स्थित है। ऐसी किंवदंती भी है कि सिद्धनाथ मंदिर के शिवलिंग की स्थापना चार सिद्ध ऋषि सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार ने सतयुग में की थी। इसी कारण इस मंदिर का नाम सिद्धनाथ है। हिंदू और जैन पुराणों में इस स्थान का कई बार उल्लेख हुआ है। इसे सब पापों का नाश कर सिद्धिदाता तीर्थस्थल माना गया है। |
| कर्णेश्वर महादेव : मालवांचल में कौरवों-पांडवों ने अनेक मंदिर बनाएँ थे जिनमें से एक है सेंधल नदी के किनारे बसा यह कर्णेश्वर महादेव का मंदिर। करनावद (कर्णावत) नगर के राजा कर्ण यहाँ बैठकर ग्रामवासियों को दान दिया करते थे इस कारण इस मंदिर का नाम कर्णेश्वर मंदिर पड़ा। मध्यप्रदेश के इंदौर से 30 किलोमिटर पर स्थित देवास जिले में स्थित है करनावद ग्राम। |
| नटराज मंदिर चिदंबरम : तमिलनाडु में चिदंबरम का नटराज मंदिर चेन्नई-तंजावुर मार्ग पर चेन्नई से 245 किमी दूर स्थित है। पुराणों के मुताबिक भगवान यहाँ प्रणव मंत्र 'ॐ' के आकार में विराजमान हैं। भगवान शिव के पाँच क्षेत्रों में से एक है चिदंबरम। इसे शिव का आकाश क्षेत्र कहा जाता है। अन्य चार क्षेत्रों में कालाहस्ती (आंध्रप्रदेश) अर्थात वायु, कांचीपुरम यानी पृथ्वी, तिरुवनिका- जल और अरुणाचलेश्वर (तिरुवनामलाई) अर्थात अग्नि शामिल हैं। शिव के नटराज स्वरूप के नृत्य का स्वामी होने के कारण भरतनाट्यम के कलाकारों के लिए इस स्थान का खास महत्व है। |
शिवलीन हुए भक्त
| श्रावण मास के प्रथम सोमवार को सुबह की रिमझिम फुहारों को देख लगा कि स्वयं इंद्रदेव भी देवाधिदेव महादेव का जलाभिषेक करने आ पहुँचे हैं। अमूमन हर शिवालय पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। अनेक मंदिरों के सामने तो श्रद्धालुओं की कतारें सड़क तक आ पहुँची थीं। बाहर पूजन सामग्रियों की जमकर खरीदारी हुई। |
| स्वर्ण कलश से भोलेनाथ का सतत गौ दुग्ध धारा से अभिषेक कर झमाझम बारिश की सामूहिक प्रार्थना की गई। शिव मंदिर में भगवान का बिल्व पत्रों, पुष्पों व दूध से अभिषेक कर शिव-परिवार का रूद्राभिषेक किया। भगवान भोलेनाथ का सूखे मेवों और रंगबिरंगी चूड़ियों से आकर्षक श्रृंगार किया गया। शाम को गणपति-गजानन स्वरूप में भगवान को सजाकर सूखे मेवों से मनोहारी श्रृंगार किया गया। |
| समूचे मंदिर परिसर की आकर्षक पुष्प व विद्युत सज्जा की गई है। सवा ग्यारह लाख ॐ नमः शिवाय मंत्रों का जाप, 51 हजार पार्थिव शिवलिंगों का पूजन, रूद्री पाठ, शिवपुराण पाठ, आरती, प्रसाद वितरण आदि अनुष्ठान हुए। |
| शिव पूजा की महिमा अनंत :- भगवान शिव की आराधना यदि श्रद्धा और विश्वास के साथ की जाए तो कभी निष्फल नहीं होती। शिव जल्दी प्रसन्न होने वाले हैं। उनके स्मरण, ध्यान-दर्शन एवं पूजन से श्रावण मास में अच्छी वर्षा होती है, क्योंकि उन्हें सबसे ज्यादा प्रिय जल ही है। शिव का पूजन मृत्यु को बचाने या उसका भय कम करने के लिए भी होता है। शिव पूजा की महिमा अनंत है। |
| शिव आराधना से भय, क्रोध, कामना एवं काम से भी मुक्ति मिलती है। ईश्वर तो सर्वत्र और सर्वदा है, उसे इधर-उधर नहीं खुद अपने अंतर्मन में ही खोजने का प्रयास करना चाहिए। बाह्य आँखों और अन्य इंद्रियों से केवल जगत के दर्शन होंगे, मन की आँखों से कोशिश करेंगे तो जगदीश भी मिल जाएँगे। |
श्रावण सोमवार व्रत कथा
श्रावण सोमवार की कथा के अनुसार अमरपुर नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। दूर-दूर तक उसका व्यापार फैला हुआ था। नगर में उस व्यापारी का सभी लोग मान-सम्मान करते थे। इतना सबकुछ होने पर भी वह व्यापारी अंतर्मन से बहुत दुखी था क्योंकि उस व्यापारी का कोई पुत्र नहीं था।
दिन-रात उसे एक ही चिंता सताती रहती थी। उसकी मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-संपत्ति को कौन संभालेगा।
पुत्र पाने की इच्छा से वह व्यापारी प्रति सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करता था। सायंकाल को व्यापारी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाया करता था।
उस व्यापारी की भक्ति देखकर एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा- 'हे प्राणनाथ, यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है। कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है। भगवान, आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें।'
भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा- 'हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है।'
FILE
इसके बावजूद पार्वतीजी नहीं मानीं। उन्होंने आग्रह करते हुए कहा- 'नहीं प्राणनाथ! आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। यह आपका अनन्य भक्त है। प्रति सोमवार आपका विधिवत व्रत रखता है और पूजा-अर्चना के बाद आपको भोग लगाकर एक समय भोजन ग्रहण करता है। आपको इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान देना ही होगा।'
पार्वती का इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा- 'तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूं। लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।'
उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई।
भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर दिया। व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ महीने पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र जन्म से व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं। बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह मनाया गया।
व्यापारी को पुत्र-जन्म की अधिक खुशी नहीं हुई क्योंकि उसे पुत्र की अल्प आयु के रहस्य का पता था। यह रहस्य घर में किसी को नहीं मालूम था। विद्वान ब्राह्मणों ने उस पुत्र का नाम अमर रखा।
जब अमर 12 वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ। व्यापारी ने अमर के मामा दीपचंद को बुलाया और कहा कि अमर को शिक्षा प्राप्त करने के लिए वाराणसी छोड़ आओ। अमर अपने मामा के साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए चल दिया। रास्ते में जहां भी अमर और दीपचंद रात्रि विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते थे।
लंबी यात्रा के बाद अमर और दीपचंद एक नगर में पहुंचे। उस नगर के राजा की कन्या के विवाह की खुशी में पूरे नगर को सजाया गया था। निश्चित समय पर बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे के एक आंख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था। उसे इस बात का भय सता रहा था कि राजा को इस बात का पता चलने पर कहीं वह विवाह से इनकार न कर दें। इससे उसकी बदनामी होगी।
वर के पिता ने अमर को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊंगा।
वर के पिता ने इसी संबंध में अमर और दीपचंद से बात की। दीपचंद ने धन मिलने के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली। अमर को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी चंद्रिका से विवाह करा दिया गया। राजा ने बहुत-सा धन देकर राजकुमारी को विदा किया।
अमर जब लौट रहा था तो सच नहीं छिपा सका और उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया- 'राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूं। अब तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है।'
जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इनकार कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर अमर अपने मामा दीपचंद के साथ वाराणसी पहुंच गया। अमर ने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया।
जब अमर की आयु 16 वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न, वस्त्र दान किए। रात को अमर अपने शयनकक्ष में सो गया। शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही अमर के प्राण-पखेरू उड़ गए। सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-पीटने लगा। आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे।
मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने। पार्वतीजी ने भगवान से कहा- 'प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें।'
भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर अमर को देखा तो पार्वतीजी से बोले- 'पार्वती! यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।'
पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया- 'हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें। नहीं तो इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। इस लड़के का पिता तो आपका परम भक्त है। वर्षों से सोमवार का व्रत करते हुए आपको भोग लगा रहा है।' पार्वती के आग्रह करने पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ बैठा।
शिक्षा समाप्त करके अमर मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां अमर का विवाह हुआ था। उस नगर में भी अमर ने यज्ञ का आयोजन किया। समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा।
राजा ने अमर को तुरंत पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा अमर और उसके मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन, वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया।
रास्ते में सुरक्षा के लिए राजा ने बहुत से सैनिकों को भी साथ भेजा। दीपचंद ने नगर में पहुंचते ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन की सूचना भेजी। अपने बेटे अमर के जीवित वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
व्यापारी ने अपनी पत्नी के साथ स्वयं को एक कमरे में बंद कर रखा था। भूखे-प्यासे रहकर व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो दोनों अपने प्राण त्याग देंगे।
व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा। अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- 'हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।' व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
सोमवार का व्रत करने से व्यापारी के घर में खुशियां लौट आईं। शास्त्रों में लिखा है कि जो स्त्री-पुरुष सोमवार का विधिवत व्रत करते और व्रतकथा सुनते हैं उनकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।
दिन-रात उसे एक ही चिंता सताती रहती थी। उसकी मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-संपत्ति को कौन संभालेगा।
पुत्र पाने की इच्छा से वह व्यापारी प्रति सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करता था। सायंकाल को व्यापारी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव के सामने घी का दीपक जलाया करता था।
उस व्यापारी की भक्ति देखकर एक दिन पार्वती ने भगवान शिव से कहा- 'हे प्राणनाथ, यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त है। कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है। भगवान, आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें।'
भगवान शिव ने मुस्कराते हुए कहा- 'हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। प्राणी जैसा कर्म करते हैं, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है।'
FILE
इसके बावजूद पार्वतीजी नहीं मानीं। उन्होंने आग्रह करते हुए कहा- 'नहीं प्राणनाथ! आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। यह आपका अनन्य भक्त है। प्रति सोमवार आपका विधिवत व्रत रखता है और पूजा-अर्चना के बाद आपको भोग लगाकर एक समय भोजन ग्रहण करता है। आपको इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान देना ही होगा।'
पार्वती का इतना आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा- 'तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूं। लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।'
उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई।
भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर दिया। व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ महीने पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न हुआ। पुत्र जन्म से व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं। बहुत धूमधाम से पुत्र-जन्म का समारोह मनाया गया।
व्यापारी को पुत्र-जन्म की अधिक खुशी नहीं हुई क्योंकि उसे पुत्र की अल्प आयु के रहस्य का पता था। यह रहस्य घर में किसी को नहीं मालूम था। विद्वान ब्राह्मणों ने उस पुत्र का नाम अमर रखा।
जब अमर 12 वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ। व्यापारी ने अमर के मामा दीपचंद को बुलाया और कहा कि अमर को शिक्षा प्राप्त करने के लिए वाराणसी छोड़ आओ। अमर अपने मामा के साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए चल दिया। रास्ते में जहां भी अमर और दीपचंद रात्रि विश्राम के लिए ठहरते, वहीं यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते थे।
लंबी यात्रा के बाद अमर और दीपचंद एक नगर में पहुंचे। उस नगर के राजा की कन्या के विवाह की खुशी में पूरे नगर को सजाया गया था। निश्चित समय पर बारात आ गई लेकिन वर का पिता अपने बेटे के एक आंख से काने होने के कारण बहुत चिंतित था। उसे इस बात का भय सता रहा था कि राजा को इस बात का पता चलने पर कहीं वह विवाह से इनकार न कर दें। इससे उसकी बदनामी होगी।
वर के पिता ने अमर को देखा तो उसके मस्तिष्क में एक विचार आया। उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊंगा।
वर के पिता ने इसी संबंध में अमर और दीपचंद से बात की। दीपचंद ने धन मिलने के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली। अमर को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी चंद्रिका से विवाह करा दिया गया। राजा ने बहुत-सा धन देकर राजकुमारी को विदा किया।
अमर जब लौट रहा था तो सच नहीं छिपा सका और उसने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया- 'राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूं। अब तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है।'
जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इनकार कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर अमर अपने मामा दीपचंद के साथ वाराणसी पहुंच गया। अमर ने गुरुकुल में पढ़ना शुरू कर दिया।
जब अमर की आयु 16 वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न, वस्त्र दान किए। रात को अमर अपने शयनकक्ष में सो गया। शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही अमर के प्राण-पखेरू उड़ गए। सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-पीटने लगा। आसपास के लोग भी एकत्र होकर दुःख प्रकट करने लगे।
मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने। पार्वतीजी ने भगवान से कहा- 'प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट अवश्य दूर करें।'
भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर अमर को देखा तो पार्वतीजी से बोले- 'पार्वती! यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।'
पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया- 'हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें। नहीं तो इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। इस लड़के का पिता तो आपका परम भक्त है। वर्षों से सोमवार का व्रत करते हुए आपको भोग लगा रहा है।' पार्वती के आग्रह करने पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया और कुछ ही पल में वह जीवित होकर उठ बैठा।
शिक्षा समाप्त करके अमर मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां अमर का विवाह हुआ था। उस नगर में भी अमर ने यज्ञ का आयोजन किया। समीप से गुजरते हुए नगर के राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा।
राजा ने अमर को तुरंत पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा अमर और उसके मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन, वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया।
रास्ते में सुरक्षा के लिए राजा ने बहुत से सैनिकों को भी साथ भेजा। दीपचंद ने नगर में पहुंचते ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन की सूचना भेजी। अपने बेटे अमर के जीवित वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
व्यापारी ने अपनी पत्नी के साथ स्वयं को एक कमरे में बंद कर रखा था। भूखे-प्यासे रहकर व्यापारी और उसकी पत्नी बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो दोनों अपने प्राण त्याग देंगे।
व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा। अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- 'हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है।' व्यापारी बहुत प्रसन्न हुआ।
सोमवार का व्रत करने से व्यापारी के घर में खुशियां लौट आईं। शास्त्रों में लिखा है कि जो स्त्री-पुरुष सोमवार का विधिवत व्रत करते और व्रतकथा सुनते हैं उनकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।
विध नामों से शिव की महिमा
| वेदों, पुराणों और उपनिषदों में अनेक नामों से शिव की महिमा गाई गई है। उनमें से कुछ नाम यहाँ उद्धृत किए जा रहे हैं : |
| हर-हर महादेव, रुद्र, शिव, अंगीरागुरु, अंतक, अंडधर, अंबरीश, अकंप, अक्षतवीर्य, अक्षमाली, अघोर, अचलेश्वर, अजातारि, अज्ञेय, अतीन्द्रिय, अत्रि, अनघ, अनिरुद्ध, अनेकलोचन, अपानिधि, अभिराम, अभीरु, अभदन, अमृतेश्वर, अमोघ, अरिदम, अरिष्टनेमि, अर्धेश्वर, अर्धनारीश्वर, अर्हत, अष्टमूर्ति, अस्थिमाली, आत्रेय, आशुतोष, इंदुभूषण, इंदुशेखर, इकंग, ईशान, ईश्वर, उन्मत्तवेष, उमाकांत, उमानाथ, उमेश, उमापति, उरगभूषण, ऊर्ध्वरेता, ऋतुध्वज, एकनयन, एकपाद, एकलिंग, एकाक्ष, कपालपाणि, कमंडलुधर, कलाधर, कल्पवृक्ष, कामरिपु, कामारि, कामेश्वर, कालकंठ, कालभैरव, काशीनाथ, कृत्तिवासा, केदारनाथ, कैलाशनाथ, क्रतुध्वसी, क्षमाचार, गंगाधर, गणनाथ, गणेश्वर, गरलधर, गिरिजापति, गिरीश, गोनर्द, चंद्रेश्वर, चंद्रमौलि, चीरवासा, जगदीश, जटाधर, जटाशंकर, जमदग्नि, ज्योतिर्मय, तरस्वी, तारकेश्वर, तीव्रानंद, त्रिचक्षु, त्रिधामा, त्रिपुरारि, त्रियंबक, त्रिलोकेश, त्र्यंबक, दक्षारि, नंदिकेश्वर, नंदीश्वर, नटराज, नटेश्वर, नागभूषण, निरंजन, नीलकंठ, नीरज, परमेश्वर, पूर्णेश्वर, पिनाकपाणि, पिंगलाक्ष, पुरंदर, पशुपतिनाथ, प्रथमेश्वर, प्रभाकर, प्रलयंकर, भोलेनाथ, बैजनाथ, भगाली, भद्र, भस्मशायी, भालचंद्र, भुवनेश, भूतनाथ, भूतमहेश्वर, भोलानाथ, मंगलेश, महाकांत, महाकाल, महादेव, महारुद्र, महार्णव, महालिंग, महेश, महेश्वर, मृत्युंजय, यजंत, योगेश्वर, लोहिताश्व, विधेश, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, विषकंठ, विषपायी, वृषकेतु, वैद्यनाथ, शशांक, शेखर, शशिधर, शारंगपाणि, शिवशंभु, सतीश, सर्वलोकेश्वर, सर्वेश्वर, सहस्रभुज, साँब, सारंग, सिद्धनाथ, सिद्धीश्वर, सुदर्शन, सुरर्षभ, सुरेश, हरिशर, हिरण्य, हुत सोम, सृत्वा, |
शिव ताण्डव स्तोत्र
| जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले |
| गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्। |
| डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं |
| चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥ |
| जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी । |
| विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि । |
| धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके |
| किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥ |
| धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर- |
| स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे । |
| कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि |
| कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥ |
| जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा- |
| कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे । |
| मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे |
| मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥ |
| सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर- |
| प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः । |
| भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः |
| श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥ |
| ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा- |
| निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम् । |
| सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं |
| महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥ |
| कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- |
| द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके । |
| धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक- |
| प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥ |
| नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर- |
| त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः । |
| निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः |
| कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥ |
आरती : जय शिव ओंकारा
| जय शिव ओंकारा ॐ जय शिव ओंकारा । |
| ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ जय शिव...॥ |
| एकानन चतुरानन पंचानन राजे । |
| हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ जय शिव...॥ |
| दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे। |
| त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ जय शिव...॥ |
| अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी । |
| चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥ ॐ जय शिव...॥ |
| श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे । |
| सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ जय शिव...॥ |
| कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता । |
| जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता ॥ ॐ जय शिव...॥ |
| ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका । |
| प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ जय शिव...॥ |
| काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी । |
| नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ जय शिव...॥ |
| त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे । |
| कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ जय शिव...॥ |
Subscribe to:
Posts (Atom)






